नई दिल्ली, 16 सितंबर 2025 — उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग और यौन उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को निर्देश दिया है कि वह रैगिंग और यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में सख्त निगरानी तंत्र स्थापित करे। कोर्ट ने साफ कहा कि “छात्रों की गरिमा और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।”
न्यायालय की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि, “शिक्षण संस्थान छात्रों के लिए एक सुरक्षित स्थान होने चाहिए। यदि वहाँ रैगिंग या यौन उत्पीड़न जैसी घटनाएँ होती हैं, तो यह न केवल संस्थान की विफलता है, बल्कि संविधान के तहत मिले मूल अधिकारों का उल्लंघन भी है।”
कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि कई संस्थान रैगिंग और यौन शोषण की घटनाओं को या तो दबा देते हैं या समय पर कार्रवाई नहीं करते, जिससे पीड़ित छात्र मानसिक और शारीरिक रूप से बुरी तरह प्रभावित होते हैं।
UGC को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने UGC को निम्नलिखित निर्देश दिए:
- हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में एंटी-रैगिंग और महिला उत्पीड़न विरोधी सेल सक्रिय किया जाए।
- सभी संस्थानों को यह अनिवार्य किया जाए कि वे इन सेल्स की जानकारी कॉलेज वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करें।
- हर 6 महीने में इन मामलों की समीक्षा रिपोर्ट तैयार कर UGC को सौंपनी होगी।
- जिन संस्थानों में रैगिंग या यौन उत्पीड़न के मामले दबाने की कोशिश की जाएगी, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी, जिसमें फंड रोकना भी शामिल हो सकता है।
हालिया घटनाओं से जुड़ी पृष्ठभूमि
कोर्ट की सख्ती की एक बड़ी वजह हाल ही में देश के कई हिस्सों में सामने आई रैगिंग की घटनाएं हैं, जिनमें कुछ छात्रों को आत्महत्या तक करनी पड़ी। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के प्रमुख संस्थानों में हुए घटनाक्रमों ने समाज में चिंता पैदा कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया।
विशेषज्ञों की राय
शिक्षा विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। इससे संस्थानों पर जवाबदेही बढ़ेगी और छात्रों को अपनी शिकायतें दर्ज कराने के लिए एक सुरक्षित मंच मिलेगा।
मानवाधिकार कार्यकर्ता मीनाक्षी अरोड़ा का कहना है, “अब वक्त आ गया है कि संस्थान सिर्फ प्रोस्पेक्टस में ‘नो रैगिंग’ की नीति लिखने तक सीमित न रहें, बल्कि उसे जमीनी स्तर पर लागू भी करें।”
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश छात्रों की सुरक्षा और शिक्षा के अनुकूल माहौल सुनिश्चित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि UGC और शिक्षण संस्थान इसे कितनी गंभीरता से लागू करते हैं। यदि सही ढंग से पालन किया गया, तो यह न केवल रैगिंग और यौन उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने में सहायक होगा, बल्कि छात्रों में आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना भी बढ़ेगी।











